दर्ज़ी की दुकान का एक सोमवार (एक मिली-जुली कहानी)
शाम 4:10। फ़ोन फिर बजा।
सुनीता को अपने ब्लाउज़ का पता करना है। राजेश को अपने कुर्ते का। आप सुई रखते हैं, कॉपी ढूँढते हैं और पन्ने पलटते हैं।
पर्ची खो गई।
फटा पन्ना और धुँधला नंबर। ग्राहक को माप दोबारा देने आना पड़ता है, और वह खुश नहीं है।
शुक्रवार बना शनिवार।
किसी को पता नहीं था कि ब्लाउज़ फिनिशिंग में अटका है। तारीख़ निकल गई। त्योहार इंतज़ार नहीं करता।